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7/13/2019

जाति व्यवस्था का अर्थ, परिभाषा और विशेषताएं

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आप सभी का www.khaskhabr.com में, आज के इस लेख मे हम बात करेंगे भारतीय ग्रामीण जाति व्यवस्था के बारे में। ग्रामीण समाज की सामाजिक संरचना का मुख्य आधार जाति रही है। परम्परागत ग्रामीण समाज की संरचना में जाति प्रस्थिति निर्धारण का आधार रही है। किसी भी व्यक्ति की जाति उसके जन्म से निर्धारित होती है।
जाति व्यवस्था की संक्षिप्त जानकारी के बाद अब हम जाति व्यवस्था का अर्थ, जाति व्यवस्था की परिभाषाएं और जाति व्यवस्था की विशेषताएं विस्तार से जानेंगे।
जाति व्यवस्था का अर्थ
जाति

जाति व्यवस्था का अर्थ

अंग्रेजी में जाति के लिए Caste शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। Caste शब्द पुर्तगाली भाषा के Casta से बना है। जिसका अभिप्राय प्रजाति, नस्ल से अर्थात् जन्मगत आधार से है।
जाति व्यवस्था के अर्थ को सही तरीके से समझने के लिए जाति व्यवस्था की परिभाषाओं को जानना भी बहुत ही जरूरी हैं--

जाति व्यवस्था की परिभाषा

जाति परिभाषा न. 1. मजूमदार के अनुसार, "जाति एक बंद वर्ग है।"
जाति की परिभाषा न. 2. कूले के अनुसार, "जब एक वर्ग पूर्णतया वंशानुक्रम पर आधारित होता है, तब उसे हम जाति कह सकते है।"  इस परिभाषा मे जाति को वंशानुक्रम की विशेषता माना गया है।
जाति की परिभाषा न. 3. मर्टिण्डेल और मोनैक्सी के अनुसार, " जाति व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है, जिनके कर्तव्यों तथा विशेषधिकारों का जादू अथवा धर्म दोनों से समर्पित तथा स्वीकृत भाग जन्म से निश्चित होता है।
जाति की परिभाषा न. 4. केतकर के अनुसार, " जाति एक ऐसा सामाजिक समूह है, जिसकी सदस्यता केवल उन व्यक्तियों तक सीमित है जो सदस्यों से जन्म लेते हैं और इस प्रकार से पैदा हुए व्यक्ति ही इसमें सम्मिलित होते हैं। ये सदस्य एक कठोर सामाजिक नियम द्वारा समूह के बाहर विवाह करने से रोक दिये जाते हैं।
उक्त परिभाषाओं के आधार पर जाति व्यवस्था की कुछ विशेषताएं स्पष्ट होती है। तो चलिए जानते है----
जाति व्यवस्था की विशेषताएं

यह है जाति व्यवस्था की विशेषताएं 

1. जाति जन्म पर आधारित होती है
जाति व्यवस्था की सबसे प्रमुख विशेषता यह है की जाति जन्म से आधारित होती है। जो व्यक्ति जिस जाति मे जन्म लेता है वह उसी जाति का सदस्य बन जाता है।
2. जाति का अपना परम्परागत व्यवसाय
प्रत्येक जाति का एक परम्परागत व्यवस्था होता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण जजमानी व्यवस्था रही है। जजमानी व्यवस्था मे जातिगत पेशे के आधार पर परस्पर निर्भरता की स्थिति सामाजिक संगठन का आधार थी। लेकिन आज आधुनिकता के चलते नागरीकरण, औधोगीकरण आदि के चलते अब जाति का अपना परम्परागत व्यवसाय बहुत कम रह गया है।
3. जाति स्थायी होती है
जाति व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति की जाति हमेशा के लिए स्थायी होती है उसे कोई छुड़ा नही सकघता या बदल नही सकता। कोई भी व्यक्ति अगर आर्थिक रूप से, राजनैतिक रूप से या किसी अन्य साधन से कितनी भी उन्नति कर ले लेकिन उसकी जाति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नही हो सकता।
4. ऊंच- नीच की भावना
हांलाकि अब वर्तमान भारतीय ग्रामीण समाज में जाति के परम्परागत संस्तरण के आधारों मे परिवर्तन आया है। लेकिन फिर भी जाति ने समाज को विभिन्न उच्च एवं निम्न स्तरों में विभाजित किया गया है प्रत्येक जाति का व्यक्ति अपनी जाति की सामाजिक स्थिति के प्रति जागरूक रहता है।
5. मानसिक सुरक्षा प्रदान करना
जाति व्यवस्था में हांलाकि दोष बहुत है लेकिन जाति व्यवस्था की अच्छी बात यह है कि यह अपने सदस्यों को मानसिक सुरक्षा प्रदान करती है। जिसमें सभी सदस्यों को पता होता है कि उनकी स्थिति क्या है? उन्हें क्या करना चाहिए।
6. विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध
जाति व्यवस्था के अर्न्तगत जाति के सदस्य अपनी ही जाति मे विवाह करते है। अपनी जाति से बाहर विवाह करना अच्छा नही माना जाता है। उदाहरण के लिए ब्राह्माण के लड़के का विवाह ब्राह्राण की लड़की से ही होगा। किसी अन्य जाति से नही।
7. समाज का खण्डात्मक विभाजन
जाति व्यवस्था ने संपूर्ण समाज का खण्ड-खण्ड मे विभाजन कर रखा है। समाज का विभाजन होना देश की एकता के लिए सही नही है।
तो दोस्तो इस लेख से सम्बन्धित या जाति व्यवस्था से सम्बन्धित आपका कोई विचार या सवाल है तो नीचे comment कर जरूर बताए।

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